नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को पटना हाईकोर्ट के एक अजीबोगरीब आदेश पर चिंता जताई। हत्या के एक मामले में आरोपी को जमानत तो दे दी गई, लेकिन बिना कोई कारण बताए उसे छह महीने बाद रिहा करने का निर्देश दिया गया। जस्टिस अभय ओका और जस्टिस उज्ज्वल भयान की पीठ ने आरोपी जितेंद्र पासवान को हाईकोर्ट के आदेश की शर्तों के आधार पर अंतरिम जमानत दे दी है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा “यह अजीब बात है कि हाईकोर्ट ने कहा है कि जमानत देने का आदेश 6 महीने बाद लागू होगा। 2 सितंबर को वापसी योग्य नोटिस जारी किया गया। हम उन शर्तों और नियमों पर अंतरिम जमानत देते हैं जिनका उल्लेख विवादित आदेश के पैराग्राफ नौ में किया गया है।”
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस अभय ओका ने कहा, “यह किस तरह का आदेश है? कुछ अदालतें छह महीने या एक साल के लिए जमानत दे रही हैं। अब यह एक अलग प्रकार का आदेश है। न्यायालय ने कहा कि वह जमानत पाने का हकदार है, लेकिन उसे छह महीने बाद रिहा किया जाना चाहिए।”
कोर्ट जमानत दिए जाने के बावजूद आरोपी को छह महीने बाद रिहा करने के हाईकोर्ट के निर्देश को चुनौती देने वाली अपील पर सुनवाई कर रहा था। आरोपी के वकील ने तर्क दिया कि इस शर्त के लिए कोई कारण नहीं दिया गया, जिससे जमानत पूरी तरह से भ्रामक हो गई।
पटना हाईकोर्ट ने आरोपी को जमानत देते हुए एक विवादित आदेश पारित किया, जो आईपीसी की धारा 147, 148, 149, 341, 323, 324, 326, 307 और 302 के तहत एक मामले में फंसा हुआ है।
पासवान सहित 19 नामजद आरोपियों के खिलाफ कथित तौर पर मुखबिर और उसके परिवार पर हमला करने के आरोप में प्राथमिकी दर्ज की गई थी। यह आरोप लगाया गया है कि पासवान के उकसावे पर अन्य आरोपियों ने मुखबिर के परिवार पर हमला किया।
पटना हाईकोर्ट ने जितेंद्र पासवान को जमानत दी थी, जिसमें 15 हजार रुपये का जमानत बांड भी शामिल है। 30,000 रुपये का जुर्माना और दो जमानतदार जैसे कई शर्तें भी लगाई गईं। नियमित रूप से अदालत में पेश होने के लिए भी कहा गया है। साथ ही पुलिस स्टेशन में हर महीने उपस्थित होना और सबूतों के साथ छेड़छाड़ या आगे कोई अपराध करने पर जमानत रद्द करने की बात कही गई है।




