कोरबा। Shivay Hospital Korba : उम्मीद कितनी भी छोटी क्यों न हो, अगर उसे संभालने वाले हाथ मजबूत हों तो जिंदगी मुश्किल से मुश्किल जंग भी लड़ सकती है। कोरबा के शिवाय हॉस्पिटल में जन्मे 600 ग्राम के एक नन्हे मासूम की कहानी कुछ ऐसी ही है, जिसने जन्म के बाद करीब 90 दिनों तक जिंदगी की कठिन परीक्षा का सामना किया और अब 2 किलो 70 ग्राम वजन के साथ डिस्चार्ज होने की स्थिति तक पहुंच गया है।
सर्वमंगला नगर निवासी विजय समर्थ और उनकी पत्नी करीब चार साल से अपने घर में बच्चे की किलकारी का इंतजार कर रहे थे। चार साल बाद जब खुशियों ने दस्तक दी, तो उसके साथ एक ऐसी चुनौती भी आई, जिसने पूरे परिवार को चिंता में डाल दिया।
15 जून की वह रात…Shivay Hospital Korba

15 जून 2026 की रात करीब 1 बजे गर्भवती महिला को गंभीर और आपात स्थिति में शिवाय हॉस्पिटल, कोरबा लाया गया। गर्भकाल महज 25 सप्ताह था। स्थिति को देखते हुए अस्पताल की टीम ने तत्काल जांच और आवश्यक चिकित्सा प्रक्रिया शुरू की। डाक्टरों के कुशल मतदर्शन में करीब 2:20 बजे डिलीवरी हुई, लेकिन खुशी के उस पल के साथ परिवार के सामने जिंदगी की सबसे कठिन चुनौती खड़ी थी। नवजात का वजन महज 600 ग्राम था। इतना छोटा शरीर… और जिंदगी की इतनी बड़ी जंग।
नवजात को तत्काल NICU में भर्ती किया गया। इसके बाद शुरू हुआ करीब 90 दिनों का वह सफर, जिसमें हर दिन बच्चे की सांस और स्वास्थ्य को लेकर परिवार की उम्मीदें जुड़ी रहीं।
90 दिन NICU में… हर दिन उम्मीद और इंतजार Shivay Hospital Korba
600 ग्राम के इस अति-प्रीमैच्योर बच्चे को करीब तीन महीने तक NICU में विशेषज्ञ चिकित्सा निगरानी में रखा गया। इस दौरान उसे विशेष नवजात देखभाल, श्वसन सहायता, नियंत्रित तापमान और लगातार मॉनिटरिंग की जरूरत रही। इस पूरे उपचार के दौरान Paediatric विशेषज्ञ Dr. Nagendra Bagri सहित NICU की टीम ने बच्चे की लगातार निगरानी की। परिवार के लिए हर दिन एक ही सवाल होता था…आज बच्चा कैसा है?और हर छोटे सुधार के साथ उम्मीद थोड़ी और मजबूत होती गई।
धीरे-धीरे मासूम का वजन बढ़ने लगा। उसकी स्थिति में सुधार आता गया और 600 ग्राम से शुरू हुआ सफर अब 2.070 किलोग्राम तक पहुंच चुका है।
आरएमओ डॉ प्रवीण और डॉ बरखा ने भी संभाली कमान
नवजात की देखरेख के लिए आरएमओ डॉ प्रवीण और डॉ बरखा ने भी अहम भूमिका निभाते हुए लगातार बच्चे की देखरेख में लगे है। डॉ प्रवीण ने कहा कि हमारा उद्देश्य सिर्फ मरीज का बेहतर उपचार कर उन्हें नए जीवन देने का प्रयास करना।
डर से उम्मीद तक… पिता की आंखों में बदली तस्वीर
बच्चे के पिता विजय समर्थ उस मुश्किल दौर को याद करते हुए भावुक हो जाते हैं। उनका कहना है कि पहली बार जब उन्होंने अपने बच्चे को देखा तो वह बेहद छोटा और नाजुक था। परिवार के लिए वह समय बेहद कठिन था।
विजय समर्थ के अनुसार, शिवाय हॉस्पिटल की डॉक्टरों और नर्सिंग टीम ने इलाज के साथ परिवार को लगातार हिम्मत दी। करीब तीन महीने तक बच्चे की देखभाल और निगरानी ने परिवार को उम्मीद बनाए रखने की ताकत दी।आज वही बच्चा पहले से कहीं ज्यादा मजबूत है।
चार साल के लंबे इंतजार के बाद परिवार के लिए यह सिर्फ बच्चे के स्वस्थ होने की खबर नहीं, बल्कि उनकी सबसे बड़ी खुशी की वापसी है।
600 ग्राम से 2.070 किलो तक…
15 जून को जन्म के समय जिस बच्चे का वजन महज 600 ग्राम था, 19 सितंबर तक उसका वजन बढ़कर 2 किलो 70 ग्राम हो गया।परिवार के लिए यह महज वजन का आंकड़ा नहीं है।यह 90 दिनों की चिंता, इंतजार, दुआ और उम्मीद का हिसाब है।
शिवाय हॉस्पिटल के डॉक्टर नागेंद्र बागरी के अनुसार बच्चे की स्थिति में लगातार सुधार हुआ है और अब उसे डिस्चार्ज किए जाने की तैयारी है।
शिवाय हॉस्पिटल: जहां नन्ही सांसों की जंग में परिवार के साथ खड़ी रही टीम
600 ग्राम जैसे बेहद कम वजन वाले नवजात की देखभाल में लगातार निगरानी और विशेषज्ञ चिकित्सा की जरूरत होती है। ऐसे समय में Dr. Nagendra Bagri (Paediatric), Dr. Barkha (Duty Doctor) और NICU टीम की निरंतर चिकित्सा निगरानी ने इस नन्हे मासूम के उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
शिवाय हॉस्पिटल की NICU टीम के लिए भी यह मामला एक चुनौतीपूर्ण नवजात देखभाल का उदाहरण रहा, जहां उपचार के साथ परिवार को लगातार भरोसा और हिम्मत देना भी जरूरी था।





