Questions about EVMs सोर्स कोड साझा करना अनिवार्य है, EVM पर सवाल क्यों, जानिए EVM का पूरा सिस्टम

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दिल्ली : Questions about EVMs सोर्स कोड साझा करना अनिवार्य है,और इस लड़ाई में राहुल गांधी का खड़ा होना लोकतंत्र की अनिवार्य लड़ाई का हिस्सा है.यह कहना कि ईवीएम का सोर्स कोड साझा करने से मशीनें असुरक्षित हो जाएँगी, तकनीकी भ्रम नहीं है. यह एक जानबूझकर रचा गया तर्क है—ताकि चुनावी प्रक्रिया को जनता की निगाह से दूर रखा जा सके. आज जब राहुल गांधी संसद के भीतर और बाहर इस सवाल को लगातार उठा रहे हैं, तो यह केवल विपक्ष की राजनीति नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आख़िरी रेखा की रक्षा है.

Questions about EVMs

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सुरक्षा का अर्थ गोपनीयता नहीं होता. सुरक्षा का अर्थ होता है सत्यापन. जो प्रणाली देश की सत्ता तय करती है, उसका तर्क जनता से छुपा हो—यह लोकतंत्र नहीं, एक नियंत्रित अनिश्चितता है. दुनिया की सबसे सुरक्षित प्रणालियाँ ओपन-सोर्स हैं. इंटरनेट Linux पर चलता है, बैंकिंग ओपन क्रिप्टोग्राफी पर, और सुरक्षित संचार खुले कोड पर आधारित है। कोड छुपाने से सुरक्षा नहीं बढ़ती—सिर्फ़ सवाल दब जाते हैं.

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भारत में यह प्रश्न इसलिए निर्णायक हो जाता है क्योंकि ईवीएम बनाने वाली कंपनियाँ—भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड—पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में हैं, और उनके बोर्ड में भाजपा से संबंधित व्यक्तियों की नियुक्तियाँ दस्तावेज़ीकृत तथ्य हैं. यह कोई आरोप नहीं, रिकॉर्ड है. ऐसी स्थिति में सोर्स कोड को गोपनीय रखना निष्पक्षता नहीं, बल्कि सत्ता की सुविधा बन जाता है.

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यही वह बिंदु है जहाँ राहुल गांधी का हस्तक्षेप ऐतिहासिक महत्व रखता है. उन्होंने इस मुद्दे को तकनीकी बहस से निकालकर लोकतांत्रिक अधिकार के स्तर पर रखा है. उनका सवाल सीधा है—अगर मशीन निष्पक्ष है, तो उसकी जाँच से डर क्यों? अगर प्रक्रिया ईमानदार है, तो पारदर्शिता से परहेज़ क्यों? यह प्रश्न किसी पार्टी का नहीं, हर मतदाता का है.

दुनिया इसका उत्तर पहले ही दे चुकी है. जर्मनी की सर्वोच्च अदालत ने कहा कि ऐसी कोई चुनावी प्रणाली स्वीकार्य नहीं, जिसे आम नागरिक सत्यापित न कर सके. नीदरलैंड ने अपारदर्शी मशीनें हटाईं. अमेरिका के कई राज्यों ने चुनावी सॉफ्टवेयर को ओपन-सोर्स किया. इन देशों ने समझ लिया कि लोकतंत्र भरोसे से नहीं, जाँच से चलता है.

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भारत में उल्टा हो रहा है. यहाँ जनता से कहा जाता है कि वह मशीन पर भरोसा करे, लेकिन मशीन का दिमाग़—यानी सोर्स कोड—जनता से छुपा रहता है. इस छुपाव को ‘सुरक्षा’ कहा जाता है, जबकि सच यह है कि ब्लैक बॉक्स सिस्टम ही सबसे बड़ा खतरा होता है. जहाँ जाँच नहीं, वहाँ गलती, छेड़छाड़ और पक्षपात—सब संभव है.

सोर्स कोड साझा करने का अर्थ मशीन को असुरक्षित करना नहीं है. इसका अर्थ मशीन को जवाबदेह बनाना है. कोड सार्वजनिक होगा तो हर बदलाव दर्ज होगा, हर पंक्ति पर निगरानी होगी, और कोई भी राजनीतिक या संस्थागत हस्तक्षेप छुपा नहीं रह सकेगा.

आज जब सत्ता चुप्पी को सुरक्षा कह रही है, तब राहुल गांधी पारदर्शिता को लोकतंत्र की शर्त के रूप में सामने रख रहे हैं. यही किसी लोकतांत्रिक योद्धा की पहचान होती है—वह जो असुविधाजनक सवाल पूछे, जब पूरा तंत्र चुप रहना चाहता हो.

ईवीएम जनता की है.
चुनाव जनता का है.
और मशीन का दिमाग़ भी जनता का ही होना चाहिए.

जो लोकतंत्र अपने नागरिकों से कोड छुपाता है, वह अंततः अधिकार भी छुपाने लगता है.
इसीलिए ईवीएम का सोर्स कोड साझा करना जोखिम नहीं—लोकतंत्र की रक्षा है.

गजेंद्र अवस्थी की कलम से…✍️ #viral #india #viralnews

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