helplessness of the elderly : 17 महीने में 32 वरिष्ठ नागरिकों ने छोड़ा स्नेह सदन,उप संचालक हरीश सक्सेना का कुप्रबंधन, सरकारी वृद्धाश्रम बना ‘बेबस बुजुर्गों’ का पलायन केंद्र?

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कोरबा।helplessness of the elderly :  समाज कल्याण विभाग, कोरबा द्वारा संचालित स्नेह सदन वृद्धाश्रम एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। जनवरी 2025 से मई 2026 तक महज 17 महीनों में 32 वरिष्ठ नागरिकों ने वृद्धाश्रम छोड़ दिया, जबकि वर्तमान में यहां केवल 20 बुजुर्ग ही निवासरत हैं। करोड़ों रुपये की लागत से तैयार इस वृद्धाश्रम से लगातार हो रहा बुजुर्गों का पलायन व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर रहा है।

helplessness of the elderly 

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सर्वमंगला मंदिर के समीप स्थित भंडारा गृह भवन को डीएमएफ मद से एक करोड़ रुपये से अधिक की लागत से 60 सीटर स्नेह सदन वृद्धाश्रम में परिवर्तित किया गया था। इसके संचालन के लिए भी प्रतिमाह बड़ा बजट निर्धारित है। बावजूद इसके, आश्रय गृह से लगातार बुजुर्गों के वापस लौटने की घटनाएं सामने आ रही हैं। सूचना का अधिकार में मिली जानकारी के अनुसार, जनवरी 2025 में 8 बुजुर्गों ने प्रवेश लिया था, लेकिन उसी महीने 3 बुजुर्ग आश्रम छोड़कर चले गए। इसके बाद लगभग हर महीने किसी न किसी बुजुर्ग ने वृद्धाश्रम छोड़ दिया। मई 2026 तक कुल 32 वरिष्ठ नागरिक आश्रम से वापस जा चुके हैं।

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सूत्रों के अनुसार, स्नेह सदन में भारी अव्यवस्था, उपेक्षा और प्रबंधन की खामियों को लेकर कई बुजुर्गों ने समाज कल्याण विभाग के उप संचालक हरीश सक्सेना और परिवीक्षा अधिकारी मुकेश दिवाकर से शिकायत भी की थी। आरोप है कि इन शिकायतों पर कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। जानकारी यह भी सामने आई है कि नगर पालिक निगम के सर्वमंगला जोन प्रभारी ने भी समाज कल्याण विभाग को पत्र लिखकर व्यवस्थाओं में सुधार की आवश्यकता बताई थी, लेकिन हालात में कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं आया।

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वृद्धाश्रम के संचालन को लेकर एक और गंभीर आरोप सामने आया है। आरोप है कि जरूरतमंद वरिष्ठ नागरिकों को प्रवेश देने के बजाय चयन मनमाने तरीके से किया जाता है, जिसके कारण कई पात्र बुजुर्गों को आश्रय नहीं मिल सका। अब सवाल यह उठ रहा है कि जब करोड़ों रुपये की लागत और नियमित बजट के बावजूद बुजुर्ग स्वयं वृद्धाश्रम छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं, तो आखिर जिम्मेदार कौन है? क्या समाज कल्याण विभाग इन गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जांच कर व्यवस्था में सुधार करेगा, या फिर स्नेह सदन केवल कागजों में ही “स्नेह” का प्रतीक बनकर रह जाएगा?

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