कांग्रेस के पूर्व पार्षद महेश अग्रवाल की कथा या आत्मकथा कार्यकर्ता अब ‘यूज़र’ है, परिवार नहीं ?पढ़िए उनकी कलम से 

- Advertisement -

कोरबा ( ब्लैकआउट न्यूज़ )कांग्रेसबके पूर्व पार्षद महेश अग्रवाल का यह लेख सोशल मिडिया में वायरल है जिसमे उन्होंने राजनितिक दलों पर कटाक्ष करते हुए लिखा है हालांकि खुद भी कांग्रेस के नेता है और सक्रिय राजनीती में उनका बड़ा योगदान रहा है हालांकि यह स्पष्ट नहीं है की यह कथा है या आत्मकथा बहरहाल पढ़िए उनकी खुद की कलम से

- Advertisement -

एक समय था जब राजनीति में कार्यकर्ता सबसे बड़ी पूंजी होता था। आज समय बदल गया है। अब सबसे बड़ी पूंजी है—पद, प्रचार और प्रोफाइल फोटो। पहले नेता के घर का दरवाज़ा हमेशा खुला रहता था, आज विपरीत स्थिति है।

पहले कार्यकर्ता किसी भी जिले में किसी वरिष्ठ नेता जनप्रतिनिधि के यहां पहुंच जाए तो वहां का नेता कहता था नाश्ता करिए, चाय लीजिए —”भोजन करिए, फिर काम देखते हैं।” आज जवाब मिलता है—”भाई, पहले टाइम लेकर आते , फिर देखेंगे।”

पहले जेब में पैसे कम होते थे,गाड़िया तो यदा कदा किसी के पास होती थी, लेकिन दिल बहुत बड़ा होता था। आज गाड़ियों का काफिला लंबा है, लेकिन मिलने का समय छोटा पड़ गया है।

पहले संगठन की पहचान थी—सेवा।अब पहचान है—सेल्फी। पहले गद्रे स्मृति भवन से लिखा गया एक पत्र पूरे प्रदेश के लिए आदेश नहीं, अपनापन होता था। आज सैकड़ों व्हाट्सऐप ग्रुप हैं, हजारों संदेश हैं, लेकिन जरूरत के समय मुश्किल में कोई मिलता नहीं है।

पहले नेता पूछता था—”घर में सब ठीक है? खाना खाया?” आज पूछता है—”अगला चुनाव किसके साथ हो?” पहले कार्यकर्ता का बेटा बीमार पड़ जाए तो नेता अस्पताल पहुंच जाता था। आज कार्यकर्ता खुद अस्पताल में है और नेता सोशल मीडिया पर “शीघ्र स्वास्थ्य लाभ” लिखकर अपना कर्तव्य पूरा मान लेता है।

पहले राजनीति एक परिवार थी। मतभेद थे, लेकिन मनभेद नहीं थे। पद छोटे-बड़े हो सकते थे, लेकिन कार्यकर्ता कभी छोटा नहीं होता था।आज राजनीति में सबसे तेज़ विकास अगर किसी चीज़ का हुआ है, तो वह है ‘मैं’ का।”हम” धीरे-धीरे शब्दकोश से गायब हो गया है।

सबकी सुविधाएं बढ़ीं, संसाधन बढ़े, सबके एसी कार्यालय बन गए, लग्जरी गाड़ियां आ गईं, मोबाइल और सोशल मीडिया आ गए, लेकिन रास्ते में थके हुए कार्यकर्ता को देखकर गाड़ी रोक देने वाली संवेदना कहीं पीछे छूट गई।

आज राजनीति में संगठन कम और प्रबंधन अधिक दिखाई देता है। समर्पण कम और समीकरण अधिक दिखाई देते हैं। रिश्ते कम और नेटवर्क अधिक दिखाई देते हैं।

कड़वा है, लेकिन सच है—

पहले नेता कार्यकर्ता बनाता था,
आज कार्यकर्ता नेता बनाता है… और नेता बनने के बाद वही कार्यकर्ता पहचान में नहीं आता।

- Advertisement -
Latest news
- Advertisement -
Related news
- Advertisement -