चेकबाउंस के मामले मे अपूर्व वासन को 2 साल की सजा,जेल की जगह पहुंचे अस्पताल,जेलर ने कहा यहाँ इस नाम का कोई मुल्ज़िम नहीं, न्याय व्यवस्था पर प्रहार

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चेकबाउंस के मामले मे अपूर्व वासन को 2 साल की सजा,जेल की जगह पहुंचे अस्पताल,जेलर ने कहा यहाँ इस नाम का कोई मुल्ज़िम नहीं, न्याय व्यवस्था पर प्रहार

कोरबा। सत्या ट्रकिंग प्राईवेट लिमिटेड के द्वारा लाए गए विचाराधीन चेक बाउंस मामले में शहर के एक ट्रांसपोर्टर आयुष वासन को दों साल की सजा सुनाई गयी । पूर्व में 28 दिसम्बर 2020 को न्यायालय प्रथम श्रेणी से दोषमुक्ति के निर्णय उपरांत व्यथित होकर की गई अपील पर फैसला आते ही आरोपी को न्यायिक रिमांड पर जेल दाखिल करने की कार्रवाई की गई।

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लेकिन न्याय व्यवस्था को धत्ता बताते हुए आरोपी को जेल ना ले जाकर सीधे अस्पताल में भर्ती कराया गया हद तो तब हो गई जब जेलर से पूछा गया की 6 मार्च को न्यायालय द्वारा सुनाई गई सजा का आरोपी आयुष वासन आपके यहां मौजूद है जेलर ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस नाम का कोई मुलजिम जेल में आया ही नहीं है इसी मामले में आज हाईकोर्ट ने अपूर्व वासन को जमानत भी दे दी लेकिन सवाल यह उठता है की क्या न्याय व्यवस्था इतनी कमजोर है की हर कोई उसे व्यवस्था को अपने हिसाब से चलाने का प्रयास करने लगा है

 

यह है मामला

 

मिली जानकारी के अनुसार परिवादी संस्था सत्या ट्रकिंग द्वारा एम.एन. अंसारी को प्रकरण से संबंधित संपूर्ण कार्य करने हेतु अधिकृत किया गया है। परिवादी संस्था भारत बेंझ कंपनी के भारी वाहनों का अधिकृत विक्रेता और वाहनों की सर्विस प्रदान करने का व्यवसाय करता है। अभियुक्त ट्रांसपोर्टिंग का व्यवसाय करता है और समय-समय पर अपने वाहनों को मरम्मत के लिए परिवादी संस्था में लाता है, जिसका हिसाब परिवादी अपने अभिलेख में इन्द्राज कर समय-समय पर राशि प्राप्त करता है। वाहनों की मरम्मत की आंशिक भुगतान हेतु अभियुक्त ने परिवादी को अपने भारतीय स्टेट बैंक शाखा कोरबा, में स्थित अपने खाते का चैक रकम 9,83,166 रूपये दिनाँकित 20.09.2016 भुगतान हेतु प्रदान किया था। 03.10.2016 को परिवादी ने उक्त चैक को भारतीय स्टेट बैंक सिटी ब्रांच कोरबा में जमा किया, जो बैंक द्वारा भुगतान रोके जाने के कारण भुगतान होना संभव न हो पाना कहते हुए परिवादी को वापस कर दिया गया।

 

उक्त रिटर्न मेमो प्राप्ति पश्चात् परिवादी द्वारा अधिवक्ता के माध्यम से दिनाँक 07.10.2016 को अभियुक्त को ऋण राशि भुगतान करने एवं कथित चेक अनादरण होने की सूचना दी गई। अभियुक्त इस बात की भली भांति जानकारी रखते हुए कि उसके द्वारा दिए गए चैक से परिवादी को भुगतान राशि प्राप्त होना है, तथापि अभियुक्त ने भुगतान रोके जाने का निर्देश देकर परिवादी के साथ कपट करते हुए उसे हानि पहुंचाई है। उपरोक्त आधारों पर परिवादी द्वारा अधिनियम की धारा 138 के तहत परिवाद विशेष न्यायाधीश (एससी -एसटी एक्ट) जयदीप गर्ग के समक्ष प्रस्तुत किया गया।

मामले की सुनवाई करते हुए माननीय न्यायाधीश ने आरोपी अपूर्व को 2 वर्ष के कारावास की सजा एवं 16 लाख रुपया अर्थ दंड की सजा सुनाई वही सजा के उपरांत जेल वारंट जारी कर जेल भेजने का आदेश दिया लेकिन अपने रसूख का इस्तेमाल करते हुए अपूर्व वासन 6 मार्च से लेकर अब तक जेल दाखिल हुआ ही नहीं बल्कि यूं कह लीजिए कि उसे आदेश की कॉपी या मुलजिम दोनों ही जेल नहीं पहुंचे माननीय न्यायालय ने आदेश कर दिया और अपूर्व वासन ने अपनी व्यवस्थाओं के तहत उसे आदेश की धज्जियां उड़ाते हुए अस्पताल में दाखिल हो गए और वहां वीआईपी रूम में आराम फरमा रहे.

पुलिस और डॉक्टर की भूमिका पर संदेह

यहां गौर करने वाली बात यह है कि जेल वारंत के बाद पुलिस की जिम्मेदारी यह है कि वह मुलजिम को जेल तक पहुंचाएं उसके बाद अगर स्वास्थ्य खराब हो भी तो जेल से अस्पताल भेजा जाता है लेकिन यहां सीधे कोर्ट से अस्पताल भेज दिया गया वहीं अस्पताल में डॉक्टर ने उसे एडमिट भी कर लिया और वीआईपी रूम अलर्ट भी हो गया यह रसूक का कमाल इस मामले की खुलासे के बाद अब देखना यह है की न्यायालय इस पर क्या संज्ञान लेता है वही हाई कोर्ट में मुलजिम को जेल में होना बताया गया है जबकि मुलजिम अब तक जेल नहीं पहुंचा है यानी कि हाई कोर्ट को भी झूठ परोस कर वहां से जमानत ले ली गई.

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