कोरबा की महिला पत्रकारों ने देखा X नक्सलियों का स्वच्छ चेहरा,गोलियों की गूंज से रसोई तक का सफर
कोरबा (ब्लैकआउट न्यूज़) कोरबा की महिला पत्रकारों को कोरबा विधायक एवं प्रदेश के श्रम एवं आबकारी मंत्री लखन लाल देवांगन द्वारा तीन दिवसीय बस्तर दौरा का आयोजन किया इस दौरे में महिला पत्रकारों ने उन दावों पर भी बारीकी से अध्ययन किया जिसमें अमित शाह ने बस्तर को नक्सली मुक्त घोषित किया हुआ है महिला पत्रकारों ने X नक्सलियों से भी मुलाकात की जो जंगल में कभी एक-47 लेकर गोलियों की गूंज के बीच अपनी जिंदगी जी रही थी आज वह महिलाएं सामान्य जीवन जी रही है ऐसे ही कुछ महिलाओं से महिला पत्रकारों ने मुलाकात की जो आज रसोई की शोभा बढ़ा रही है और लोगों को स्वादिष्ट व्यंजन बनाकर परोस रही है यह देखकर महिला पत्रकार जहां भाव विभोर हुई वही महिलाओं से हंसी ठिठोली करते हुए उनकी आप बीती भी सुनी आइये जानते हैं वरिष्ठ महिला पत्रकार बिता चक्रवर्ती की ग्राउंड रिपोर्ट

कोरबा। बस्तर की जमीन पर बदलाव अब केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि लोगों की जिंदगी में साफ दिखने लगा है। कभी नक्सल हिंसा के साये में जीने वाला यह इलाका अब धीरे-धीरे सामान्य जीवन की ओर लौट रहा है। इसी बदलती तस्वीर को समझने कोरबा से पहुंची महिला पत्रकारों की टीम ने एक ऐसी कहानी देखी, जो बस्तर के बदलाव की सबसे सजीव तस्वीर बनकर सामने आई।

जगदलपुर के “पंडुम रेस्टोरेंट” में काम कर रही महिला प्रमिला की कहानी इस बदलाव का सबसे संवेदनशील चेहरा है। यह वही महिला है, जो कभी जंगलों में भटकते हुए एके-47 जैसे हथियार चलाती थी। बंदूक की आवाज और डर के माहौल में उसकी पहचान बनी थी। लेकिन आज वही हाथ चूल्हे की आंच संभाल रहे हैं। अब उसकी उंगलियों से गोलियां नहीं निकलतीं, बल्कि स्वाद की खुशबू फैलती है। महिला बताती है कि उस दौर में जिंदगी केवल आदेश और डर के बीच सिमट गई थी। गांवों से दूर, परिवार से कटकर, हथियार ही उसका सहारा बन गए थे। लेकिन हालात बदलने लगे। सुरक्षा बलों की पहल और आत्मसमर्पण की नीति ने उसे एक नई राह दिखाई। उसने हथियार छोड़ने का फैसला लिया और मुख्यधारा में लौट आई।

आज वही महिला रेस्टोरेंट में काम कर रही है। चेहरे पर संतोष है और जिंदगी में स्थिरता। वह कहती है कि अब डर नहीं लगता, अब सुकून है। पहले जहां हर दिन अनिश्चितता से भरा होता था, अब रोजमर्रा की साधारण जिंदगी ही सबसे बड़ी खुशी बन गई है। इसी कड़ी में आसमाती, फूलमती और फगनी पोयाम जैसी महिलाएं भी आत्मसमर्पण के बाद मुख्यधारा से जुड़कर नई शुरुआत कर रही हैं। इस बदलाव को करीब से देखने पर साफ होता है कि बस्तर अब केवल संघर्ष की पहचान नहीं रहा। यहां लोग नए अवसरों की ओर बढ़ रहे हैं। आत्मसमर्पण करने वाले कई लोग आज रोजगार से जुड़कर सम्मानजनक जीवन जी रहे हैं।
ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान यह भी नजर आया कि लोगों के मन से धीरे-धीरे डर खत्म हो रहा है। बाजारों में रौनक बढ़ रही है, सड़कें पहले से ज्यादा सुरक्षित महसूस होती हैं और स्थानीय लोग खुलकर अपनी बात कहने लगे हैं। बस्तर की यह कहानी केवल एक महिला की नहीं है, बल्कि उस पूरे क्षेत्र की है, जो बंदूक की छाया से निकलकर अब विकास और विश्वास की राह पर आगे बढ़ रहा है।





